About Arya Samaj Founder Swami Dayanand Saraswati Biography in Hindi

Arya Samaj ke sansthapak kaun the? (who is the founder of Arya Samaj) क्या आपके मन में भी कभी ये सवाल आया हैं ? तो आज के इस लेख में हम आपको समाज की कुप्रथाओं को तोड़ने वाले “arya samaj founder – Swami Dayanand Saraswati biography in hindi” के बारे में बताने वाले हैं। 

स्वामी दयानन्द सरस्वती के जीवन परिचय के अंतर्गत, इनके परिवार, शिक्षा, शुरवाती जीवन, विचार, आर्य समाज की स्थापना, आदि के बारे में जानकारी साझा की गई हैं। 

Swami Dayanand Saraswati Biography
Swami Dayanand Saraswati Biography (Photos)


Key points of Swami Dayanand Saraswati biography in hindi (मुख्य बिंदु) :

  • नाम – स्वामी दयानन्द सरस्वती 
  • जन्मनाम – मूल शंकर
  • जन्म – 12 फरवरी 1824 
  • स्थान – टंकारा (गुजरात)
  • पिता – करशनजी लालजी तिवारी 
  • माता – यशोदाबाई 
  • पत्नी – अविवाहित
  • संस्थापक – आर्य समाज (सन् 1875)
  • रचना – सत्यार्थप्रकाश
  • मृत्यु – 30 अक्टूबर 1883 (अजमेर)
  • आयु – 60 वर्ष 

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About Arya Samaj founder Swami Dayanand Saraswati Biography in Hindi (जीवनी) :

आर्य समाज के संस्थापक “महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती” का जन्म 12 फरवरी 1824 को गुजरात के टंकारा में, एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता करशनजी लालजी तिवारी, एक शिव भक्त थे और इनकी माता का नाम यशोदाबाई था। 

कम उम्र में अपना घर छोड़ देने वाले दयानन्द सरस्वती ने कई सामाजिक बुराइयों और कुप्रथाओं का विरोध किया और उन्हें ख़त्म करने में भी अहम भूमिका निभाई। 

इन्होनें अलग-अलग धर्मों की मान्यताओं और विचारधाराओं पर प्रश्न खड़े किये और कई विद्वानों और धर्मगुरुओं से इस विषय पर बहस की। अंत में इन्होनें अपने ज्ञान और विचारों को फ़ैलाने के लिए आर्य-समाज की स्थापना की। 

इनकी शिक्षा, सन्यासी जीवन और आर्य समाज की सफलता की कहानी का विवरण आगे दिया गया हैं। 

Early life of Maharshi Dayanand Saraswati (शुरवाती जीवन) :

स्वामी दयानन्द सरस्वती का जन्म नाम “मूल शंकर” था। जैसा की हमने बताया की ये एक ब्राह्मण परिवार से थे और इनका पूरा परिवार शिव भक्त था। बचपन से ही इन्हें, भगवान् शिव की आराधना के लिए प्रेरित किया गया। 

केवल 8 वर्ष की आयु में इनका “जनेऊ संस्कार” हो गया और इन्हें हिंदुत्व की शिक्षा के लिए गुरुकुल भेज दिया गया। 

इनके बचपन का एक किस्सा बेहत प्रचलित हैं। जिसमें शिवरात्रि के अवसर पर दयानन्द सरस्वती ने एक चूहें को भगवान् शिव को चढ़ाया गया प्रसाद खाते हुए देखा। इसके बाद, इन्हे विचार आया की 

भगवान् शिव, इस चूहें से अपने प्रसाद को नहीं बचा पा रहे, तो समस्त संसार की रक्षा कैसे करेंगे

इन्होनें अपने जीवन के शुरवाती 21 साल (सन् 1824 से सन् 1845) अपने परिवार के साथ ही बिताए। लेकिन, जब ये 21 साल के हुए, तब घरवालों ने इन्हे शादी के लिए लड़की दिखाई। 

तब सन्यासी जीवन जीने के इच्छुक, दयानंदजी ने अपना घर छोड़ने का निर्णाय लिया और भारत भ्रमण के लिए निकल पड़े।


Education of Maharshi Dayanand Saraswati (शिक्षा) :

सन् 1845 में घर त्यागने के बाद लगभग 25 वर्षों तक धर्म और ज्ञान की तलाश में दयानन्द सरस्वती ने समस्त भारत का भृमण किया। लेकिन, उन्हें ज्ञान और अच्छाई के बदले केवल समाज की कुप्रथाएं नज़र आई। 

घूमते-घूमते ये मथुरा आ पहुंचे, यहाँ इनकी भेंट सबसे अनुशाषित और कठोर शिक्षक “विराजानन्द दंडिशा” से हुई जिनके सानिध्य में ज्ञान प्राप्त करने का अवसर मिला। गुरु दंडिशा ने इन्हे समस्त वेदों का ज्ञान दिया और शिक्षा पूरी होने पर “ऋषि दयानन्द” की उपाधि से सम्मानित भी किया। 


Arya samaj founder (आर्य समाज के संस्थापक) :

स्वामीजी ने कई सालों तक पूरे समाज में भ्रमण किया और देखा की पंडित और धर्मगुरु, भगवान् की पूजा और अनुष्ठान के नाम पर गरीब लोगों से बहुत सारी दक्षिणा लेते हैं। 

दयानंदजी का ये मनना था की भगवान् की आराधना बिना किसी पुजारी को दक्षिणा दिए, केवल प्रेम और भक्ति की भावना से भी की जा सकती हैं। 

इसके अलावा इन्होनें कई सामाजिक कुप्रथा देखि, जैसे – लड़कियों की कम उम्र में शादी कर देना, महिलाओं का सम्मान और सुरक्षा का अभाव, जातीवाद, इत्यादि। 

इस तरह महर्षि ने समाज और विभिन्न धर्मों पर प्रश्न उठाकर उनके नकारात्मक पहलु को उजागर किया। तत्पश्चात लोगों को सही ज्ञान का बोध कराने के लिए 7 अप्रैल 1875 को मुंबई में “आर्य-समाज” की स्थापना की गई। 

Principles of Arya samaj (आर्यसमाज के सिद्धांत) :

आर्य-समाज की स्थापना के साथ ही इसके कुछ नियम अथवा सिद्धांत भी निश्चित किए गए। ये सिद्धांत निम्नलिखित हैं : 

१. इंसान अपने अंतर्मन से पूर्ण विश्वास के साथ भगवान् का स्मरण करता हे तो उसे किसि भी मूर्ति को पूजने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। 

२. भगवान् हर मनुष्य के प्रति दयावान, करुणावान, बुद्धिमान, सर्वज्ञ और हितेषी हैं। वह अनंत हे और सबके लिए सामान भाव रखता हैं। इंसान बिना पुजारी के भी भगवान् की निश्छल भाव से भक्ति कर सकता हैं। 

३. हमेशा सत्य और न्याय के साथ खड़े रहो और असत्य और अनन्याय को उजागर कर उसके खिलाफ आवाज़ उठाओ। 

४. हमेशा धर्म के रास्ते पर चलो, कभी भी किसी बुरे कर्म में भागिदार ना बनो। 

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५. आर्य समाज का मुख्य उद्देश्य, अधर्म और अनीति से चल रहे संसार का सही मार्गदर्शन कर उसका भला करना हैं। 

६. एक इंसान को दूसरे इंसान के साथ हमेशा विनम्र, न्यायपूर्वक और करुणापूर्वक व्यव्हार करना चाहिए। 

७. हमेशा अज्ञानता के अंधकार को उजागर कर, उसे ज्ञान के प्रकाश से नष्ट करने का प्रयास करे। 

८. हमेशा दूसरों की भलाई में अपनी भलाई समझते हुए, सब की मदद करे और कभी भी निजी लाभ को महत्ता ना दे। 

९. एक सभ्य सामज के लिए बनाये गए सभी नियमों का पूर्ण रूप से पालन करें। 

About Swami Dayanand Saraswati achievements (उपलब्धियां) :

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने हमेशा मूर्ति पूजा का विरोध किया और अंतर्मन से की गई प्राथना को ही सच्ची आराधना माना। इसके परिणाम स्वरुप लोगों में जागरूपता आई और उन्हें सही मार्गदर्शन मिला। 

महर्षिजी ने समाज को नारी-शिक्षा का भी महत्त्व समझाया और महिलाओं को सम्मान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

हिंदुत्व पर अपने विचार व्यक्त करते हुए स्वामीजी ने कहा की, व्यक्ति की अज्ञानता या अल्पज्ञान ही हिंदुत्व के पतन का सबसे बड़ा कारण हैं। 

महर्षि दयानन्द सरस्वती ने अपने ज्ञान को लोगो तक पहुँचाने के लिए कई गुरुकुलों की शुरवात की। जिसमें इन्होनें अपने शिष्यों के ज्ञानवर्धन का काम किया और उन्हें आम लोगों तक इस ज्ञान को पहुँचाने का दायित्व दिया। 

Maharshi Dayanand Saraswati death (मृत्यु) :

एक बार जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह ने आर्य समाज से जुड़ने की इच्छा जताई। इसी उपलक्ष में राजा ने महर्षि दयानन्दजी को महल में आमंत्रित किया। लेकिन, जब स्वामीजी महल में पहुंचे तब राजा एक बच्ची का नृत्य देख रहे थे। 

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स्वामीजी को यह बात पसंद नहीं आई और इन्होनें राजा जसवंत सिंह को कहा की , एक आर्य समाजी इस तरह के काम नहीं करता हे। इससे राजा सहमत हुए लेकिन, वह नृत्यिकी नाराज़ हो गई। 

तब उसने रसोइये के साथ मिलकर, दयानन्द सरस्वती के दूध में कांच के टुकड़े मिला दिए और जब उन्होंने ये दूध पिया तो उनका स्वस्थ बिगड़ गया। 

राजा जसवंत सिंह ने उन्हें बचाने का बहुत प्रयास किया लेकिन, 30 अक्टूबर 1883 को दिवाली के अवसर पर सबुह 6 बजे स्वामी दयानन्द सरस्वती की म्रत्यु हो गई। 

Maharshi Dayanand Saraswati college (विश्वविद्यालय) :

इनकी मृत्यु के बाद शिष्यों ने सन् 1883 में “दयानन्द एंग्लो वैदिक कॉलेज” की स्थापना की। इसका मुख्य उद्देश्य स्वामीजी के ज्ञान को पूरी दुनिया में फैलाने का रहा। 

पहला “दयानन्द एंग्लो वैदिक विश्वविद्यालय” की शुरवात सन् 1886 में लाहौर में हुई। जिसमे “लाला हंसराज” को संचालक की ज़िम्मेदारी दी गई। 

Contribution of Swami Dayanand Saraswati :

दयानन्द सरस्वती ने कभी किसी स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया। लेकिन, भारत के कई बड़े स्वतंत्रता सेनानी इनसे प्रभावित हुए और इनके बताये हुए मार्ग पर सतत चलने का प्रयास किया। 

इन स्वतंत्र सेनानियों में मुख्य नाम थे – सुभाष चंद्र बोस, मदन लाल ढींगरा, महादेव गोविन्द रानाडे, राम प्रसाद बिस्मिल, विनायक दामोदर सावरकर, मैडम कामा, लाला लाजपत राय, इत्यादि। 


Swami Dayanand Saraswati writting works (रचनाएँ) :

अपने पूरे जीवन काल में इन्होनें 60 से ज्यादा रचनाएँ की। जिसमे 16 खण्डों में समस्त वेदों का भावार्थ, अष्टाध्याय का सरल विवरण, नैतिकता पर आधारित कुछ कहानियां शामिल हैं। 

स्वामी दयानन्द सरस्वती की सबसे अध्भुत रचना “अद्वैत वेदांत” को कहा जाता हैं। इसके अतिरिक्त, इन्होनें निम्नलिखित रचनाएँ की –

  • सत्यार्थ-प्रकाश 
  • सत्यार्थ-भूमिका 
  • संस्कारविधि 
  • ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका 
  • ऋग्वेद-भाष्यम 
  • यजुर्वेद-भाष्यम 

Arya samaj history in hindi (आर्य समाज का इतिहास) :

मानव कल्याण और सही ज्ञान के विस्तार के लिए 1875 में स्थापित किया गया आर्य समाज, आज दुनिया के अलग-अलग देशों में अपनी सेवाएं दे रहा हैं। 

इन देशों में आर्य समाज के सबसे ज्यादा अनुयायी हे – सयुंक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, त्रिनिदाद, मेक्सिको, यूनाइटेड किंगडम, नेदरलेंड्स, ऑस्ट्रेलिया, होन्ग-कोंग, थाईलैंड, सिंगापुर, पाकिस्तान, बर्मा, केन्या, यूगांडा, मॉरिशियस, दक्षिण अफ्रीका, तंज़ानिया, आदि। 

06 FAQs on Dayanand Saraswati :

प्रश्न 1 : स्वामी दयानन्द सरस्वती की जयंती कब मनाई जाती है?
उत्तर : 12 फरवरी। 

प्रश्न 2 : क्या “सत्यमेव जयते” किताब के रचयता स्वामी दयानन्द सरस्वती हैं?
उत्तर : नहीं। 

प्रश्न 3 : दयानन्द सरस्वती की प्रमुख पुस्तक कैसी हैं?
उत्तर : अद्वैत – वेदांत। 

प्रश्न 4 : किस घटना के बाद स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अपना घर छोड़ दिया था?
उत्तर : सन्यासी जीवन जीने के इच्छुक स्वामीजी के परिवार वालों ने जब शादी का दबाव डाला तो उन्होंने घर छोड़ दिया। 
प्रश्न 5 : महर्षि दयानन्द का जन्म कब और कहा हुआ था?
उत्तर : 12 फरवरी 1824 को टंकारा, गुजरात में। 

प्रश्न 6 : दयानन्द सरस्वतीजी ने किसके कहने पर संस्कृत की जगह, हिंदी को महत्त्व दिया?
उत्तर : वर्ष 1972 में केशवचन्द्र सेन ने स्वामीजी से विनती की, की वे अपना भाषण संस्कृत के बजाय हिंदी में देना का कष्ट करें। 

Final words on Arya samaj founder Swami Dayanand Saraswati biography in hindi :

मित्रों हमें आशा हे की आपको Swami Dayanand Saraswati ka jeevan parichay पसंद आया होगा। स्वामी दयानन्द सरस्वती के जीवन से हमे यही शिक्षा मिलती हैं की हमेशा सच का साथ दे और मानव कल्याण के लिए सतत प्रयास करते रहे।

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यदि हमसे कोई जानकारी अछूती रह गई हो तो, हमें कमेंट्स में ज़रूर बताएं। 

धन्यवाद!!

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